Aghajani/یادداشت: تفاوت بین نسخهها
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| − | {{قرآن/ | + | {{متن قرآن/در جزء|56|1|}}<p></P> |
| − | + | به نام خدا که رحمتش بی اندازه است و مهربانی اش همیشگی. هنگامی که واقعه [بسیار عظیم قیامت] واقع شود، (۱)<p></P> | |
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| − | که به | + | که در واقع شدنش دروغی [در کار] نیست، (۲)<p></P> |
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| + | پست کننده [کافران] و رفعت دهنده [مؤمنان] است. (۳)<p></P> | ||
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| + | هنگامی که زمین به شدت لرزانده شود، (۴)<p></P> | ||
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| + | و کوه ها درهم کوبیده وریز ریز شوند. (۵)<p></P> | ||
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| + | در نتیجه غباری پراکنده گردد، (۶)<p></P> | ||
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| + | وشما سه گروه شوید: (۷)<p></P> | ||
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| + | سعادتمندان، چه بلند مرتبه اند سعادتمندان! (۸)<p></P> | ||
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| + | و شقاوتمندان، چه دون پایه اند شقاوتمندان! (۹)<p></P> | ||
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| + | و پیشی گیرندگان [به اعمال نیک] که پیشی گیرندگان [به رحمت و آمرزش] اند، (۱۰)<p></P> | ||
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| + | اینان مقربان اند، (۱۱)<p></P> | ||
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| + | در بهشت های پر نعمت اند. (۱۲)<p></P> | ||
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| + | بر تخت هایی زربافت، (۱۵)<p></P> | ||
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| + | در حالی که روبروی یکدیگر بر آنها تکیه دارند. (۱۶)<p></P> | ||
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| + | نوجوانانی همیشه نو جوان همواره [برای خدمت] پیرامونشان می گردند، (۱۷)<p></P> | ||
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| + | با قدح ها و کوزه ها و جام هایی از باده ناب و پاک، (۱۸)<p></P> | ||
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| + | که از نوشیدنش نه سردرد گیرند، و نه مست و بی خرد شوند، (۱۹)<p></P> | ||
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| + | آن گاه شما ای گمراهان انکار کننده! (۵۱)<p></P> | ||
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| + | قطعاً از درختی که از زقّوم است [و دارای مایعی جوشان و بسیار بدمزه و بدبوست] خواهید خورد؛ (۵۲)<p></P> | ||
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| + | و شکم ها را از آن پر خواهید کرد، (۵۳)<p></P> | ||
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| + | و روی آن از آب جوشان خواهید نوشید، (۵۴)<p></P> | ||
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| + | مانند نوشیدن شترانی که به شدت تشنه اند؛ (۵۵)<p></P> | ||
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| + | این است پذیرایی از آنان در روز جزا. (۵۶)<p></P> | ||
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| + | ما شما را آفریدیم، پس چرا [آفرینش دوباره خود را پس از مرگ] باورنمی کنید؟ (۵۷)<p></P> | ||
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| + | آیا از [حالات و دگرگونی های] نطفه ای که در رحم می ریزید آگاه هستید؟ (۵۸)<p></P> | ||
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| + | آیا شما آن را [تا انسانی معتدل و آراسته شود] می آفرینید یا ما آفریننده ایم؟ (۵۹)<p></P> | ||
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| + | ماییم که مرگ را میان شما مقدّر کردیم، و هیچ چیز ما را [در جاری کردن مرگ بر شما] مغلوب نمی کند. (۶۰)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|61|}}<p></P> | ||
| + | [آری، مرگ را مقدّر کردیم] تا امثال شما را جایگزین شما کنیم و شما را به صورتی که نمی دانید آفرینشی تازه و جدید بخشیم، (۶۱)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|62|}}<p></P> | ||
| + | و به راستی پیدایش نخستین را [که جهان فعلی است] شناختید، پس چرا متذکّر [پدید شدن جهان دیگر] نمی شوید؟! (۶۲)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|63|}}<p></P> | ||
| + | مرا خبر دهید آنچه را می کارید، (۶۳)<p></P> | ||
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| + | آیا شما آن را می رویانید، یا ما می رویانیم؟ (۶۴)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|65|}}<p></P> | ||
| + | به یقین اگر بخواهیم، آن را ریز ریز کرده و خاشاک می کنیم که متأسف و شگفت زده می شوید، (۶۵)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|66|}}<p></P> | ||
| + | [و می گویید:] مسلماً ما خسارت زده ایم، (۶۶)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|67|}}<p></P> | ||
| + | بلکه ناکام و محرومیم (۶۷)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|68|}}<p></P> | ||
| + | به من خبر دهید آبی که می نوشید، (۶۸)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|69|}}<p></P> | ||
| + | آیا شما آن را از ابر باران زا فرود آورده اید یا ما فرود آورنده ایم؟ (۶۹)<p></P> | ||
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| + | اگر بخواهیم آن را تلخ می گردانیم، پس چرا سپاس گزاری نمی کنید؟ (۷۰)<p></P> | ||
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| + | به من خبر دهید آتشی که می افروزید، (۷۱)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|72|}}<p></P> | ||
| + | آیا شما درختش را به وجود آورده اید یا ما به وجود آوردنده ایم؟ (۷۲)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|73|}}<p></P> | ||
| + | ما آن را وسیله تذکر و مایه استفاده برای صحرانشینان و بیابانگردان قرار داده ایم. (۷۳)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|74|}}<p></P> | ||
| + | پس به نام پروردگار بزرگت تسبیح گوی. (۷۴)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|75|}}<p></P> | ||
| + | پس به جایگاه ستارگان سوگند می خورم، (۷۵)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|76|}}<p></P> | ||
| + | و اگر بدانید بی تردید این سوگندی بس بزرگ است. (۷۶)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|77|}}<p></P> | ||
| + | که یقیناً این قرآن، قرآنی است ارجمند و باارزش؛ (۷۷)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|78|}}<p></P> | ||
| + | [که] در کتابی مصون از هر گونه تحریف و دگرگونی [به نام لوح محفوظ جای دارد.] (۷۸)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|79|}}<p></P> | ||
| + | جز پاک شدگان [از هر نوع آلودگی] به [حقایق و اسرار و لطایف] آن دسترسی ندارند. (۷۹)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|80|}}<p></P> | ||
| + | نازل شده از سوی پروردگار جهانیان است. (۸۰)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|81|}}<p></P> | ||
| + | آیا شما نسبت به این گفتار سهل انگاری می کنید [و آن را قابل اعتنا نمی دانید؟!] (۸۱)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|82|}}<p></P> | ||
| + | و فقط نصیب خود را این قرار می دهید که آن را انکار کنید؟! (۸۲)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|83|}}<p></P> | ||
| + | پس چرا هنگامی که روح به گلوگاه می رسد، (۸۳)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|84|}}<p></P> | ||
| + | و شما در آن وقت نظاره گر هستید [و هیچ کاری از شما ساخته نیست!] (۸۴)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|85|}}<p></P> | ||
| + | و ما به او از شما نزدیک تریم، ولی نمی بینید. (۸۵)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|86|}}<p></P> | ||
| + | [آری] پس چرا اگر شما پاداش داده نمی شوید [و به گمان خود قیامتی در کار نیست و شما را قدرتی بزرگ و فراتر است؟] (۸۶)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|87|}}<p></P> | ||
| + | آن [روح به گلوگاه رسیده] را [به بدن محتضر] برنمی گردانید، اگر [در ادعای خود] راستگویید؟ (۸۷)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|88|}}<p></P> | ||
| + | پس اگر [جان به گلو رسیده] از مقربان باشد، (۸۸)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|89|}}<p></P> | ||
| + | [در] راحت و آسایش و بهشت پرنعمت [خواهد بود.] (۸۹)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|90|}}<p></P> | ||
| + | و اگر از سعادتمندان باشد، (۹۰)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|91|}}<p></P> | ||
| + | [به او گفته می شود:] از سوی سعادتمندان بر تو سلام باد. (۹۱)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|92|}}<p></P> | ||
| + | و اما اگر از انکار کنندگان [حقایق و] گمراه باشد، (۹۲)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|93|}}<p></P> | ||
| + | پذیرایی از او با آب جوشان است، (۹۳)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|94|}}<p></P> | ||
| + | و وارد شدن به دوزخ است. (۹۴)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|95|}}<p></P> | ||
| + | [آنچه درباره این سه طایفه بیان شد،] بی تردید این است همان حقّ یقینی. (۹۵)<p></P> | ||
| + | {{متن قرآن/در جزء|56|96|}}<p></P> | ||
| + | پس به نام پروردگار بزرگت تسبیح گوی. (۹۶)<p></P> | ||
نسخهٔ ۱۶ ژوئیهٔ ۲۰۲۰، ساعت ۰۹:۱۷
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ إِذَا وَقَعَتِ الْوَاقِعَةُ
به نام خدا که رحمتش بی اندازه است و مهربانی اش همیشگی. هنگامی که واقعه [بسیار عظیم قیامت] واقع شود، (۱)
لَيْسَ لِوَقْعَتِهَا كَاذِبَةٌ
که در واقع شدنش دروغی [در کار] نیست، (۲)
خَافِضَةٌ رَافِعَةٌ
پست کننده [کافران] و رفعت دهنده [مؤمنان] است. (۳)
إِذَا رُجَّتِ الْأَرْضُ رَجًّا
هنگامی که زمین به شدت لرزانده شود، (۴)
وَبُسَّتِ الْجِبَالُ بَسًّا
و کوه ها درهم کوبیده وریز ریز شوند. (۵)
فَكَانَتْ هَبَاءً مُنْبَثًّا
در نتیجه غباری پراکنده گردد، (۶)
وَكُنْتُمْ أَزْوَاجًا ثَلَاثَةً
وشما سه گروه شوید: (۷)
فَأَصْحَابُ الْمَيْمَنَةِ مَا أَصْحَابُ الْمَيْمَنَةِ
سعادتمندان، چه بلند مرتبه اند سعادتمندان! (۸)
وَأَصْحَابُ الْمَشْأَمَةِ مَا أَصْحَابُ الْمَشْأَمَةِ
و شقاوتمندان، چه دون پایه اند شقاوتمندان! (۹)
وَالسَّابِقُونَ السَّابِقُونَ
و پیشی گیرندگان [به اعمال نیک] که پیشی گیرندگان [به رحمت و آمرزش] اند، (۱۰)
أُولَٰئِكَ الْمُقَرَّبُونَ
اینان مقربان اند، (۱۱)
فِي جَنَّاتِ النَّعِيمِ
در بهشت های پر نعمت اند. (۱۲)
ثُلَّةٌ مِنَ الْأَوَّلِينَ
گروهی بسیار از پیشینیان، (۱۳)
وَقَلِيلٌ مِنَ الْآخِرِينَ
و اندکی از پسینیان، (۱۴)
عَلَىٰ سُرُرٍ مَوْضُونَةٍ
بر تخت هایی زربافت، (۱۵)
مُتَّكِئِينَ عَلَيْهَا مُتَقَابِلِينَ
در حالی که روبروی یکدیگر بر آنها تکیه دارند. (۱۶)
يَطُوفُ عَلَيْهِمْ وِلْدَانٌ مُخَلَّدُونَ
نوجوانانی همیشه نو جوان همواره [برای خدمت] پیرامونشان می گردند، (۱۷)
بِأَكْوَابٍ وَأَبَارِيقَ وَكَأْسٍ مِنْ مَعِينٍ
با قدح ها و کوزه ها و جام هایی از باده ناب و پاک، (۱۸)
لَا يُصَدَّعُونَ عَنْهَا وَلَا يُنْزِفُونَ
که از نوشیدنش نه سردرد گیرند، و نه مست و بی خرد شوند، (۱۹)
وَفَاكِهَةٍ مِمَّا يَتَخَيَّرُونَ
و میوه ها از هر نوعی که اختیار کنند، (۲۰)
وَلَحْمِ طَيْرٍ مِمَّا يَشْتَهُونَ
و گوشت پرنده از هر گونه ای که بخواهند، (۲۱)
وَحُورٌ عِينٌ
و حوریانی چشم درشت، (۲۲)
كَأَمْثَالِ اللُّؤْلُؤِ الْمَكْنُونِ
هم چون مروارید پنهان شده در صدف؛ (۲۳)
جَزَاءً بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
پاداشی است در برابر اعمالی که همواره انجام می دادند. (۲۴)
لَا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًا وَلَا تَأْثِيمًا
در آنجا نه سخن بیهوده ای می شنوند، نه کلام گناه آلودی، (۲۵)
إِلَّا قِيلًا سَلَامًا سَلَامًا
مگر سخنی که سلام است و سلام، (۲۶)
وَأَصْحَابُ الْيَمِينِ مَا أَصْحَابُ الْيَمِينِ
و سعادتمندان چه بلند مرتبه اند سعادتمندان! (۲۷)
فِي سِدْرٍ مَخْضُودٍ
در سایه درخت سدر بی خارند، (۲۸)
وَطَلْحٍ مَنْضُودٍ
و درختان موزی که میوه هایش خوشه خوشه روی هم چیده شده است، (۲۹)
وَظِلٍّ مَمْدُودٍ
و سایه ای گسترده و پایدار، (۳۰)
وَمَاءٍ مَسْكُوبٍ
و آبی ریزان، (۳۱)
وَفَاكِهَةٍ كَثِيرَةٍ
و میوه ای فراوان، (۳۲)
لَا مَقْطُوعَةٍ وَلَا مَمْنُوعَةٍ
که پایان نپذیرد و ممنوع نشود، (۳۳)
وَفُرُشٍ مَرْفُوعَةٍ
و همسرانی بلند مرتبه، (۳۴)
إِنَّا أَنْشَأْنَاهُنَّ إِنْشَاءً
که ما آنان را با آفرینشی ویژه آفریدیم؛ (۳۵)
فَجَعَلْنَاهُنَّ أَبْكَارًا
پس آنان را همواره دوشیزه قرار داده ایم (۳۶)
عُرُبًا أَتْرَابًا
عشقورز به شوهران، و هم سن و سال با همسران. (۳۷)
لِأَصْحَابِ الْيَمِينِ
[همه این نعمت ها] برای سعادتمندان [است.] (۳۸)
ثُلَّةٌ مِنَ الْأَوَّلِينَ
گروهی بسیار از پیشینیان، (۳۹)
وَثُلَّةٌ مِنَ الْآخِرِينَ
و گروهی بسیار از پسینیان، (۴۰)
وَأَصْحَابُ الشِّمَالِ مَا أَصْحَابُ الشِّمَالِ
و شقاوتمندان، چه دون پایه اند شقاوتمندان! (۴۱)
فِي سَمُومٍ وَحَمِيمٍ
در میان بادی سوزان و آبی جوشان [قرار دارند،] (۴۲)
وَظِلٍّ مِنْ يَحْمُومٍ
و سایه ای از دودهای بسیار غلیظ و سیاه، (۴۳)
لَا بَارِدٍ وَلَا كَرِيمٍ
نه خنک است و نه آرام بخش، (۴۴)
إِنَّهُمْ كَانُوا قَبْلَ ذَٰلِكَ مُتْرَفِينَ
اینان پیش از این از نازپروردگان خود کامه و سرکش بودند، (۴۵)
وَكَانُوا يُصِرُّونَ عَلَى الْحِنْثِ الْعَظِيمِ
و همواره بر گناهان بزرگ پافشاری داشتند، (۴۶)
وَكَانُوا يَقُولُونَ أَئِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًا وَعِظَامًا أَإِنَّا لَمَبْعُوثُونَ
و پیوسته می گفتند: آیا هنگامی که مردیم و خاک و استخوان شدیم، آیا به راستی برانگیخته می شویم؟! (۴۷)
أَوَآبَاؤُنَا الْأَوَّلُونَ
و آیا پدران گذشته ما نیز برانگیخته می شوند؟! (۴۸)
قُلْ إِنَّ الْأَوَّلِينَ وَالْآخِرِينَ
بگو: بی تردید همه پیشینیان وهمه پسینیان، (۴۹)
لَمَجْمُوعُونَ إِلَىٰ مِيقَاتِ يَوْمٍ مَعْلُومٍ
برای وعده گاه روزی معین گرد آورده خواهند شد. (۵۰)
ثُمَّ إِنَّكُمْ أَيُّهَا الضَّالُّونَ الْمُكَذِّبُونَ
آن گاه شما ای گمراهان انکار کننده! (۵۱)
لَآكِلُونَ مِنْ شَجَرٍ مِنْ زَقُّومٍ
قطعاً از درختی که از زقّوم است [و دارای مایعی جوشان و بسیار بدمزه و بدبوست] خواهید خورد؛ (۵۲)
فَمَالِئُونَ مِنْهَا الْبُطُونَ
و شکم ها را از آن پر خواهید کرد، (۵۳)
فَشَارِبُونَ عَلَيْهِ مِنَ الْحَمِيمِ
و روی آن از آب جوشان خواهید نوشید، (۵۴)
فَشَارِبُونَ شُرْبَ الْهِيمِ
مانند نوشیدن شترانی که به شدت تشنه اند؛ (۵۵)
هَٰذَا نُزُلُهُمْ يَوْمَ الدِّينِ
این است پذیرایی از آنان در روز جزا. (۵۶)
نَحْنُ خَلَقْنَاكُمْ فَلَوْلَا تُصَدِّقُونَ
ما شما را آفریدیم، پس چرا [آفرینش دوباره خود را پس از مرگ] باورنمی کنید؟ (۵۷)
أَفَرَأَيْتُمْ مَا تُمْنُونَ
آیا از [حالات و دگرگونی های] نطفه ای که در رحم می ریزید آگاه هستید؟ (۵۸)
أَأَنْتُمْ تَخْلُقُونَهُ أَمْ نَحْنُ الْخَالِقُونَ
آیا شما آن را [تا انسانی معتدل و آراسته شود] می آفرینید یا ما آفریننده ایم؟ (۵۹)
نَحْنُ قَدَّرْنَا بَيْنَكُمُ الْمَوْتَ وَمَا نَحْنُ بِمَسْبُوقِينَ
ماییم که مرگ را میان شما مقدّر کردیم، و هیچ چیز ما را [در جاری کردن مرگ بر شما] مغلوب نمی کند. (۶۰)
عَلَىٰ أَنْ نُبَدِّلَ أَمْثَالَكُمْ وَنُنْشِئَكُمْ فِي مَا لَا تَعْلَمُونَ
[آری، مرگ را مقدّر کردیم] تا امثال شما را جایگزین شما کنیم و شما را به صورتی که نمی دانید آفرینشی تازه و جدید بخشیم، (۶۱)
وَلَقَدْ عَلِمْتُمُ النَّشْأَةَ الْأُولَىٰ فَلَوْلَا تَذَكَّرُونَ
و به راستی پیدایش نخستین را [که جهان فعلی است] شناختید، پس چرا متذکّر [پدید شدن جهان دیگر] نمی شوید؟! (۶۲)
أَفَرَأَيْتُمْ مَا تَحْرُثُونَ
مرا خبر دهید آنچه را می کارید، (۶۳)
أَأَنْتُمْ تَزْرَعُونَهُ أَمْ نَحْنُ الزَّارِعُونَ
آیا شما آن را می رویانید، یا ما می رویانیم؟ (۶۴)
لَوْ نَشَاءُ لَجَعَلْنَاهُ حُطَامًا فَظَلْتُمْ تَفَكَّهُونَ
به یقین اگر بخواهیم، آن را ریز ریز کرده و خاشاک می کنیم که متأسف و شگفت زده می شوید، (۶۵)
إِنَّا لَمُغْرَمُونَ
[و می گویید:] مسلماً ما خسارت زده ایم، (۶۶)
بَلْ نَحْنُ مَحْرُومُونَ
بلکه ناکام و محرومیم (۶۷)
أَفَرَأَيْتُمُ الْمَاءَ الَّذِي تَشْرَبُونَ
به من خبر دهید آبی که می نوشید، (۶۸)
أَأَنْتُمْ أَنْزَلْتُمُوهُ مِنَ الْمُزْنِ أَمْ نَحْنُ الْمُنْزِلُونَ
آیا شما آن را از ابر باران زا فرود آورده اید یا ما فرود آورنده ایم؟ (۶۹)
لَوْ نَشَاءُ جَعَلْنَاهُ أُجَاجًا فَلَوْلَا تَشْكُرُونَ
اگر بخواهیم آن را تلخ می گردانیم، پس چرا سپاس گزاری نمی کنید؟ (۷۰)
أَفَرَأَيْتُمُ النَّارَ الَّتِي تُورُونَ
به من خبر دهید آتشی که می افروزید، (۷۱)
أَأَنْتُمْ أَنْشَأْتُمْ شَجَرَتَهَا أَمْ نَحْنُ الْمُنْشِئُونَ
آیا شما درختش را به وجود آورده اید یا ما به وجود آوردنده ایم؟ (۷۲)
نَحْنُ جَعَلْنَاهَا تَذْكِرَةً وَمَتَاعًا لِلْمُقْوِينَ
ما آن را وسیله تذکر و مایه استفاده برای صحرانشینان و بیابانگردان قرار داده ایم. (۷۳)
فَسَبِّـحْ بِاسْمِ رَبِّكَ الْعَظِيمِ
پس به نام پروردگار بزرگت تسبیح گوی. (۷۴)
فَلَا أُقْسِمُ بِمَوَاقِعِ النُّجُومِ
پس به جایگاه ستارگان سوگند می خورم، (۷۵)
وَإِنَّهُ لَقَسَمٌ لَوْ تَعْلَمُونَ عَظِيمٌ
و اگر بدانید بی تردید این سوگندی بس بزرگ است. (۷۶)
إِنَّهُ لَقُرْآنٌ كَرِيمٌ
که یقیناً این قرآن، قرآنی است ارجمند و باارزش؛ (۷۷)
فِي كِتَابٍ مَكْنُونٍ
[که] در کتابی مصون از هر گونه تحریف و دگرگونی [به نام لوح محفوظ جای دارد.] (۷۸)
لَا يَمَسُّهُ إِلَّا الْمُطَهَّرُونَ
جز پاک شدگان [از هر نوع آلودگی] به [حقایق و اسرار و لطایف] آن دسترسی ندارند. (۷۹)
تَنْزِيلٌ مِنْ رَبِّ الْعَالَمِينَ
نازل شده از سوی پروردگار جهانیان است. (۸۰)
أَفَبِهَٰذَا الْحَدِيثِ أَنْتُمْ مُدْهِنُونَ
آیا شما نسبت به این گفتار سهل انگاری می کنید [و آن را قابل اعتنا نمی دانید؟!] (۸۱)
وَتَجْعَلُونَ رِزْقَكُمْ أَنَّكُمْ تُكَذِّبُونَ
و فقط نصیب خود را این قرار می دهید که آن را انکار کنید؟! (۸۲)
فَلَوْلَا إِذَا بَلَغَتِ الْحُلْقُومَ
پس چرا هنگامی که روح به گلوگاه می رسد، (۸۳)
وَأَنْتُمْ حِينَئِذٍ تَنْظُرُونَ
و شما در آن وقت نظاره گر هستید [و هیچ کاری از شما ساخته نیست!] (۸۴)
وَنَحْنُ أَقْرَبُ إِلَيْهِ مِنْكُمْ وَلَٰكِنْ لَا تُبْصِرُونَ
و ما به او از شما نزدیک تریم، ولی نمی بینید. (۸۵)
فَلَوْلَا إِنْ كُنْتُمْ غَيْرَ مَدِينِينَ
[آری] پس چرا اگر شما پاداش داده نمی شوید [و به گمان خود قیامتی در کار نیست و شما را قدرتی بزرگ و فراتر است؟] (۸۶)
تَرْجِعُونَهَا إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ
آن [روح به گلوگاه رسیده] را [به بدن محتضر] برنمی گردانید، اگر [در ادعای خود] راستگویید؟ (۸۷)
فَأَمَّا إِنْ كَانَ مِنَ الْمُقَرَّبِينَ
پس اگر [جان به گلو رسیده] از مقربان باشد، (۸۸)
فَرَوْحٌ وَرَيْحَانٌ وَجَنَّتُ نَعِيمٍ
[در] راحت و آسایش و بهشت پرنعمت [خواهد بود.] (۸۹)
وَأَمَّا إِنْ كَانَ مِنْ أَصْحَابِ الْيَمِينِ
و اگر از سعادتمندان باشد، (۹۰)
فَسَلَامٌ لَكَ مِنْ أَصْحَابِ الْيَمِينِ
[به او گفته می شود:] از سوی سعادتمندان بر تو سلام باد. (۹۱)
وَأَمَّا إِنْ كَانَ مِنَ الْمُكَذِّبِينَ الضَّالِّينَ
و اما اگر از انکار کنندگان [حقایق و] گمراه باشد، (۹۲)
فَنُزُلٌ مِنْ حَمِيمٍ
پذیرایی از او با آب جوشان است، (۹۳)
وَتَصْلِيَةُ جَحِيمٍ
و وارد شدن به دوزخ است. (۹۴)
إِنَّ هَٰذَا لَهُوَ حَقُّ الْيَقِينِ
[آنچه درباره این سه طایفه بیان شد،] بی تردید این است همان حقّ یقینی. (۹۵)
فَسَبِّـحْ بِاسْمِ رَبِّكَ الْعَظِيمِ
پس به نام پروردگار بزرگت تسبیح گوی. (۹۶)




